सरकारी गाड़ी में मुफ्त सवारी
१३ जनवरी २०१३टालिन के मेयर एडगार सविसार के सलाहकार जोहांस मेरिली ने डॉयचे वेले को बताया कि इसके पीछे दो वजह थे, एक तो शहर को प्रदूषण मुक्त कराना और दूसरा समाज कल्याण, "पिछले कुछ सालों में सड़कों पर निजी गाड़ि़यों की भरमार हो गई है. हम सड़कों को चौड़ा नहीं कर सकते लेकिन यह रास्ता अपना कर यातायात नियंत्रित कर सकते हैं."
सविसार ने बताया कि एस्टोनिया में औसत आमदनी 855 यूरो है और इस कदम से लोगों का आर्थिक फायदा भी हो सकता है, "अगर हम चार लोगों के एक परिवार का उदाहरण लें तो इस योजना से वह महीने में लगभग 55 यूरो बचा सकते हैं." शहर में 2013 के शुरू से सार्वजनिक परिवहन मुफ्त कर दिया गया है.
लोगों की पसंद
सविसार ने बताया कि लोग इसे पसंद कर रहे हैं. हालांकि किसी भी नए तंत्र को ढंग से काम करने में थोड़ा समय लगता है. उन्होंने कहा, "हम कागजी टिकट की जगह यात्रा कार्ड ला रहे हैं. कई जगह अभी पर्याप्त कार्ड मुहैया नहीं हैं लेकिन कुछ दिनों में यह समस्या हल हो जाएगी."
योजना लागू करने से पहले वोटिंग के जरिए लोगों की राय जानी गई थी. मतदान में पाया गया कि लोग इस बदलाव के लिए तैयार हैं. हालांकि अभी शुरुआत हुई है लेकिन मुफ्त ट्रांसपोर्ट से शहर का यातायात 15 फीसदी कम हुआ है. इसके अलावा सार्वजनिक परिवहन छह फीसदी ज्यादा लोग इस्तेमाल करने लगे हैं.
सरकार का दावा है कि मुफ्त ट्रांसपोर्ट से बजट पर ज्यादा बोझ नहीं पड़ा है. सविसार विस्तार से बताते हैं, "सार्वजनिक परिवहन पर लगभग सवा करोड़ यूरो हर साल खर्च होता था, जबकि शहर के विकास का बजट लगभग 489 करोड़ यूरो है. टिकटों के दाम पहले ही 70 फीसदी कम किए जा चुके हैं."
अब अगली कोशिश टालिन से शोर शराबा दूर करना है ताकि इसे पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त किया जा सके.
भारत में किस बात की देर
प्रदूषण के मामले में भारत दुनिया के अव्वल देशों में है. बड़े शहरों में ट्रैफिक जाम भी वहां आम बात है. तो क्या भारत के लिए टालिन जैसे कदम उठाना संभव नहीं? दिल्ली के पर्यावरणविद डोनू रॉय कहते हैं, "भारत में इस तरह का कोई कदम तब तक नहीं उठाया जा सकता जब तक उसमें भारी राजनैतिक दखल न हो. मुफ्त सार्वजनिक परिवहन के लिए चर्चा कई सालों से हो रही है लेकिन उस पर कोई फैसला आता दिखाई नहीं देता."
डॉयचे वेले से बातचीत में रॉय ने कहा कि हाल ही में गैरसरकारी संस्था हजार्ड सेंटर ने दिल्ली के दो अलग अलग रास्तों पर रिसर्च की. इनमें से एक पर निजी गाड़ियों के साथ पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी है और दूसरे पर सिर्फ निजी गाड़ियां.
सार्वजनिक परिवहन वाले मार्ग पर प्रदूषण कम पाया गया. अगर दिल्ली और मुंबई जैसे घनी आबादी वाले शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट मुफ्त कर दिया जाए तो ट्रैफिक के साथ प्रदूषण पर भी काबू पाया जा सकेगा. लेकिन यह मामला भी राजनैतिक दांव पेंचों और ढीलेपन की भेंट चढ़ता दिखाई देता है.
रिपोर्टः समरा फातिमा
संपादनः ए जमाल